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भारत का विकास – ग़रीबी निवारण

Posted On 8 Jan, 2017 में

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चाहे जिस दृष्टि से हम देखे हमारा देश भारत बहुत ही ग़रीब देश है. यहाँ हम किस स्तर तक ग़रीब हैं इसे जताने के लिए संयुक्त राष्ट्र की ग़रीब देशों की सूची का उल्लेख नहीं करेंगे. साथ ही अन्य ग़रीब देशों की सूची में भारत किस पायदान पर है उसका उल्लेख भी नहीं करेंगे. कारण स्पष्ट है कि और कितने देश की तुलना में हमारा पायदान कुछ ऊपर है इसकी जानकारी से हमें लाभ नहीं होगा.
ग़रीबी का अंदाज़ इसी से लगा सकते हैं कि भारत में सवा सौ करोड़ की आबादी में लगभग २० करोड़ को भूखे की सूची में रखा जा सकता है. इन्हें भरपूर भोजन भूख मिटाने के लिए भी नहीं मिलता.
यहाँ पर्याप्त मात्र में पौष्टिक आहार की बात नहीं हो रही है. केवल पेट भरने की बात यहाँ हो रही है. भारत को स्वतंत्रता मिली १५ अगस्त १९४७ को. और अभी भी हम सारे देशवासियों को पेट भर भोजन नही प्राप्त होता है. इसके लिए दोष कहाँ दिया जा सकता है. सरकारें बनती हैं जनमत के आधार पर. जन प्रतिनिधि चुने जाते हैं भारत की जनता द्वारा. राज्य सरकार बनती है जब उस राज्य के निवासी अपने प्रतिनिधि को चुनते हैं और जिस दल के हिस्से प्रतिनिधियों की संख्या अधिक होती है उस दल की सरकार उस राज्य में बनती है. भारत सरकार उस दल की होती है जिस दल को पूर्ण भारत के चुनाव में बहुमत प्राप्त होता है यानि जिस दल के निर्वाचित प्रतिनिधियों की संख्या अधिकतम है. भारत सरकार के लिए प्रतिनिधियों के चुनाव में पूरे भारत के लोग सम्मिलित होते हैं और सभी मताधिकार प्राप्त लोग इस चुनाव में मत दे सकते हैं.
अब प्रश्न यह उठता है कि जब हम खुद राज्य तथा भारत सरकार के गठन के लिए जन प्रतिनिधियों का चुनाव करते हैं तब भी इन सत्तर से अधिक वर्षों में हम अपनी मूलभूत समस्याओं के उचित समाधान में पूरी तरह असफल क्यों रहे हैं.
इसका एक कारण है कि हम जन प्रतिनिधियों का चुनाव यह देख कर नहीं करते कि अमुक व्यक्ति इस क़ाबिल है या नहीं.
दोष भारत तथा राज्य सरकारों को दी जानी चाहिए. भारत की सरकार तथा राज्यों की सरकारों के गठन के लिए प्रतिनिधियों का चयन जनता स्वयं करती है. असंवेदनशील सरकार के गठन और फिर उनके अतर्कसंगत जन हित विहीन कार्यों की ज़िम्मेदारी भी जनता को अपने ऊपर लेनी होगी. आश्चर्य हो ता है भारत की जनता की सोच पर कि हम जन प्रतिनिधियों का चुनाव यह देख कर नहीं करते कि अमुक व्यक्ति इस क़ाबिल है कि नहीं. जाति, धर्म या संप्रदाय के नाम पर वोट देने वाली भारत की जनता को समझना चाहिए कि जनहित सरकार के गठन के लिए जन प्रतिनिधियों का निर्वाचन उनकी योग्यता तथा जन हित भावना से प्रेरित हो काम करने वाले व्यक्तियों का होना चाहिए चाहे वह किसी भी धर्म, जाति या सम्प्रदाय का हो. इस सन्दर्भ में बिहार के नेता लालू यादव और उत्तर प्रदेश के नेता मुलायम सिंह यादव को उल्लेखनीय कहा जा सकता है. इन्होंने जाति धर्म और संप्रदाय का ज़हर ऐसा फैलाया है कि बिहार और उत्तर प्रदेश में ग़रीबी के निवारण का कोई रास्ता नहीं.
जन समुदाय को सही राह दिखलाने में पत्रकारों का महत्त्वपूर्ण स्थान है. हिंदी तथा अंग्रेजी समाचारपत्रों या पत्रिकाओं की भूमिका को नज़र अंदाज़ नहीं किया जा सकता. इन पत्र और पत्रिकाओं का असर समुदाय पर बहुत पड़ता है. सच्चाई यह है कि इन पत्रों का प्रकाशन किसी न किसी बिज़नस घराने से रहता है जो अपना उल्लू सीधा करने में रहते हैं. स्वतंत्र प्रकाशन हमारे देश में विडंबना है. अभी जो पत्रकारिता हमारे देश में है उसे स्वतंत्र नहीं कहा जा सकता. हमारे देश के प्रकाशन वास्तविकता में उन बिज़नस घरानों की विचार धारा से प्रेरित हैं जो इन्हें पैसे देते हैं.
ग़रीबी के निवारण के लिए यह आवश्यक है कि हम धर्म जाति और संप्रदाय के नाम पर वोट न दें. दल चाहे जो भी हो अगर आर्थिक स्तिथि के सुधार में ठोस क़दम का सुझाव प्रस्तुत करता है और उस दल के प्रत्याशी साफ़ छवि के हैं और धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर वोट की उम्मीद नहीं करते हैं तो हमें ऐसे राजनेताओं को अपना वोट देना चाहिए.
भारत के राजनेता भारत के इतिहास की गरिमा का गाथा गाकर देश को बेवकूफ बनाते हैं. या फिर धर्म या भगवान् के नाम से हमे लुभाने की बात करते हैं. पुरानी कहावत है कि भगवान उसी की सहायता करता है जो अपनी सहायता ख़ुद करते हैं. अगर हमें सशक्त होना है तो आर्थिक दशा का सुधार ज़रूरी है. इसके लिए निजी क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र में पूँजी निवेश ज़रूरी है. पूँजी निवेश से रोज़गार में सुधार आएगा जिससे खुशहाली का माहौल होगा. हमें यथा स्तिथि की नीति से अलग होना चाहिए. काम जैसे तैसे चलाने की भावना से हमे अलग होना होगा. साथ में ऐसे राजनेताओं को वोट नहीं दे जो हमे धर्म,जाति और संप्रदाय के नाम पर हमें अलग करते हैं. सार्वजनिक क्षेत्र में नि है.वेश तभी जन हित में लाभदायक होगा जब हम भ्रष्टाचार को दूर करेंगे .
अभी हमने देखा कि भ्रटाचार को दूर करने के प्रयास में नरेन्द्र मोदी के खिलाफ कितनी आवाजें उठ रही हैं. यह आवाज़ उन नेताओं की है जो हमें धर्म, जाति और संप्रदाय के नाम पर भड़काते रहे हैं और आग लगी झोपडी से लाभ उठाते रहे हैं.
नरेन्द्र मोदी अर्थ शास्त्री नहीं हैं. इनके पास सूझ बूझ है और ईमानदारी है. उसराहना अन्य दल के भारत के नेता नहीं करते चूँकि इससे उनकी काली हरकतों का पर्दाफाश होता है. इस का जवाब किसी राजनेता के पास नहीं है कि हम आज़ादी के इतने सालों बाद भी ग़रीबी के दलदल में क्यों हैं. जो राजनेता ऊंचे स्वरों में विमुद्रीकरण के विरुद्ध आवाज़ उठा रहे हैं वे सत्ता में रहकर देश को ग़रीबी से नहीं निकाल सके. अब जिसने ग़रीबी को कायम रखने वाले भ्रष्टाचारियों के विरुद्ध विमुद्रीकरण का अभियान चलाया है उसे ही सभी नेता बुरा कह रहे हैं. आश्वस्त हूँ कि आगामी प्रादेशिक चुनावों में जनता इस पर विचार करेगी.
ज़रा ध्यान दे जाने माने लोगों ने नरेन्द्र मोदी के बारे में क्या कहा है:
वर्ल्ड बैंक के चेयरमैन का कहना है “नरेन्द्र मोदी से बेहद प्रभावित हूँ भारत में आगे बढ़ने कि क्षमता अब और प्रबल हो गयी है”.
ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी के कुलपति लौइसे रिचार्डसन ने कहा ” इंडिया के PM नरेन्द्र मोदी ऑक्सफ़ोर्ड से अच्छा मैनेजमेंट जानते हैं. स्टूडेंट्स उन्हें एक बार ज़रूर सुने.”
दुनिया के सबसे बड़े मार्केटिंग गुरु फिलिप कोटलर ने कहा “मैंने दुनीया भर के लोगों को कुछ न कुछ सिखाया, पर नरेन्द्र मोदी को सिखाने के लिए मेरे पास कुछ भी नहीं, उन्हें सब आता है”
रतन टाटा ने कहा “नोट बंदी पर हमें नरेन्द्र मोदी का समर्थन करना होगा”. श्री रतन टाटा की जो छवि है एक ईमानदार उद्योगपति की इस छवि को कोई राजनेता बिगाड़ नहीं सकता.
इस प्रकार राजनेता तिलमिलाए हैं और आगामी चुनाव में मोदी को परास्त करने को आतुर हैं. जनता समझती है और ऐसे नेताओं को हाल में होने वाले प्रादेशिक चुनाव में पाठ पढ़ाएंगे कि साफ छवि क्या होती है.



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